Saturday, 2 June 2012


हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है?
तुम ही कहो कि ये अंदाज़--ग़ुफ़्तगू क्या है
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल
जब आँख ही से टपका तो फिर लहू क्या है
जो आँख ही से टपके तो फिर लहू क्या है?
चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारी जेब को अब हाजत--रफ़ू क्या है?
जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा,
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है?
रही ना ताक़त--गुफ़्तार और हो भी
तो किस उम्मीद पे कहिए कि आरज़ू क्या है
Mirzha Ghalib

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