सच और झूठ से परे
सच और झूठ की नदी,
जो बहती है, तुमसे तुम तक,
अब मै रहता नही वहां,
रोज रोज की सदी,
जो बहती है , तुमसे तुम तक,
अब मै रहता नही वहां,
लकीरों की ग़ुलामी ,
वही पुरानी कहानी
पैसों की अमीरी,
सांसें बेच, जो खरीदी
वही पुरानी कहानी,
वो राजा जी की रानी,
जो सब सोच कर सहती है ,
वैसे तो महलों में रहती है
पर बातें वही कहती है ,
तुमसे तुम तक,
तुमसे तुम तक,
अब मै... रहता नही वहां,
अब मै... रहता नही वहां,
इन दिनो, मै जहां रहता हूं,
साफ पानी सा बहता हूं,
मनमानी सा कहता हूं,
पर अब है, मेरे पास ....
चेहरे पर बदमाश ह॔सी,
गीली मिट्टी हाथों मे लसी ,
खिलौनो के कारखाने,
रंगो के दास्तानें,
मस्त मुस्काते दोस्त,
कुछ बचकाने कुछ सयाने,
खुशियो का बाजार,
हर पल बार बार,
इन दिनो मैं सपनों मे नहीं रहता हूं,
यूँ समझो कि अपनों मे ही रहता हूं,
सच और झूठ ,
हार और जीत,
आज और कल,
इन सब से परे,
तुमसे तुम तक ही नही,
जो बहती है, मुझे से, मुझ तक भी,
अब मै रहता हूं वहीं,
अब मै रहता हूं यहीं,
सच और झूठ से परे
सच और झूठ से परे
------ चेतन श्रीवास्तव





















.jpg)








